आखिरकार बेरोजगारों का गुस्सा फूटा, "बेरोजगार दिवस" के रूप में मना, भारत के "प्रधानमंत्री का जन्म दिवस !
आखिरकार बेरोजगारों का गुस्सा फूटा, "बेरोजगार दिवस" के रूप में मना, भारत के "प्रधानमंत्री का जन्म दिवस !
◆ इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज हुआ बेरोजगार हित में नरेंद्र मोदी की विफलता।◆ अब तो शर्म करो सरकार,,, बेरोजगारों की सुनो पुकार
◆ केंद्र में लंबे समय से कांग्रेस की सरकार रही तब भी बेरोजगारी की समस्या पर नहीं रहा ध्यान, और अब भाजपा सरकार बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने
पूरी तरह विफल।
◆ बेरोजगार दिवस" के बीज का अंकुरण भी पीएम मोदी के गृह राज्य से गुजरात के सीएम विजय रूपाणी के जन्म दिवस 2 अगस्त से हुआ।
◆ अब तो शर्म करो सरकार,,, "बेरोजगारों" की सुनो पुकार यह नारा लगना चाहिए...
● त्वरित टिप्पणी
◆ डायमंड शुक्ला
प्रधान संपादक, मिशन क्रांति न्यूज.
भारत देश में बढ़ती '"बेरोजगारी" सबसे जटिल समस्या बन गई है। आज देश के करोड़ों युवा "बेरोजगारी" का दंश झेलने मजबूर हैं, लेकिन केंद्र सरकार बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने बिल्कुल ही बेपरवाह है। विडम्बना है कि आज पर्यंत "बेरोजगारों" के हित में अब तक किसी तरह कारगरनीति या कोई उपलब्धियां नजर नही आ रही है और इस बात की गवाही वे खुद ब खुद दे रहे हैं कि बेरोजगारी में वे पूरी तरह विफल रहे हैं। जी हां इससे और क्या पुख्ता प्रमाण लेंगे कि भारत के कथित चहेते प्रधानमंत्री का जन्म दिवस 17 सितंबर 2020 को बेरोजगारों ने बेरोजगार दिवस के रूप में मनाया। शायद यह पहली बार हुआ हो जब देश के कई हिस्सो में प्रधानमंत्री के जन्म दिन पर "बेरोजगारों" का सब्र का बांध टूट गया और सरकार के प्रति उनका गुस्सा फूट पड़ा, पर इसे अनुचित भी करार नही दिया जा सकता ।
जब सरकार जनहित से जुड़े किसी गंभीर मुद्दे पर सोचना बंद कर दे, लोगों के हित को नजर अंदाज कर झूठी वाहवाही से ताल ठुकवाए तो आखिरकार पीडि़त जनता बर्दाश्त क्यों करे ? फिर हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी.है लोग अपनी बात ,अपने अधिकार की बात सरकार से कर सकते हैं। सरकार अगर सो रही हो तो उसे जगाना जनता का और "मीडिया" का दायित्व है। हालांकि कुछ "मीडिया" सरकार की "चाटूकारिता" पर ज्यादा ध्यान देता है जबकि "लोकतंत्र" जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा ही है फिर जनता के हित को नजरअंदाज कैसे कर सकेगी। आज देश में "बेरोजगारी" चरम पर है यह विकराल स्थिति ले चुकी है लेकिन देश के हर एक राज्य और केंद्र की सरकार पूरी तरह बताया रोजगारी पर आंख मूंद लिए हैं। वाह रे सरकार।
बेरोजगारों न अपना अधिकार कार की लड़ाई का आगाज कर दिया है और बेरोजगारी के मुद्दे पर सो रही सरकार को जगाने विरोध का एक बेहतर विकल्प ढूंढ निकाला है। हर "बेरोजगार" को इस सांकेतिक विरोध का समर्थन करना चाहिए। यह देश के इतिहास में पहली बार हुआ होगा। जब भारत के प्रधानमंत्री का जन्म दिवस पूरे देश में "बेरोजगार दिवस"के रूप में मनाया गया। मजे की बात यह है कि इस "बेरोजगार दिवस" का बीज का अंकुरण भी पीएम मोदी के गृह राज्य से गुजरात के सीएम विजय रूपाणी के जन्म दिवस 2 अगस्त से शुरू हुआ है और यही बेरोजगारी का अंकुरित बीज जो पेड़ बनकर आज पीएम नरेंद्र मोदी के जन्म दिवस को भी बेरोजगार दिवस के रूप में मनाने बेरोजगारों का गुस्सा खुलकर सामने आया। और यह जरूरी भी है झूठे वादे कर सत्ता हासिल करने वाले हर एक जनप्रतिनिधि का अगर जनहित के मुद्दे पर ध्यानाकर्षण ना हो तो यही तरीका अख्तियार करना चाहिए, शायद कुंभकर्णीय निद्रा में सो रही सरकार जागे और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही पूरी करे। हम इस बात का समर्थन कतई नहीं करते कि केंद्र में कांग्रेस की भी लंबे समय से सरकार रही तो पर भी बेरोजगारी जैसे अहम मुद्दे पर किसी तरह कोई काम नही हुआ है । जिससे "बेरोजगारी" की समस्या आज भयावाह.रूप धारण कर चुकी है, पढ़े लिखे शिक्षित बेरोजगार, इधर उधर भटक रहे हैं रोजगार की आस लगाए सरकार की ओर टकटकी लगाए हुए हैं और दूसरी ओर सरकार इस गंभीर मुद्दे को भूल, अरबों खर्च कर विदेश दौरा कर डिजिटल इंडिया, उद्योगपतियों को आगे बढ़ाने, और झूठी वाहवाही पर मस्त हैं जबकि आज भारत देश में बेरोजगारी, किसानों मजदूरों की गरीबी, महंगाई और भ्रष्टाचार ये जटिल समस्या है पर इस पर चुप्पी क्यों। जनता को जवाब चाहिए सरकार से। और "बेरोजगारों"का यह आंदोलन जो कि भारत के पीएम के जन्म दिवस पर दिखा। यह समस्याओं पर पीएम की विफलता को दर्शाता है। अब तो शर्म करो सरकार,,, "बेरोजगारों" की सुनो पुकार यह नारा लगाए जाना चाहिए। शायद इससे सरकार को कुछ शर्म आए। पर शायद यह भी उनके कानों में आवाज कर उन्हें यह जताने में विफल मछ हो जाए कि जन्म दिन पर केक काटने की बधाई की जगह पकोड़े बेचकर, तो कहीं सब्जी बेचकर, बेरोजगार सड़क पर उतर आए वह भी भारत के प्रधानमंत्री के जन्म दिवस परक्षयह दिन इतिहास के सुनहरे पन्नों पर दर्ज हो गया ,
अब देखना यह है कि इस विरोध का सरकार पर कितना फर्क पड़ा है हालांकि जनहित से भटके सरकार को जगाना टेढ़ी खीर है अब यह तो साल भर बाद आगामी जन्म दिवस पर ही पता चलेगा कि सरकार बेरोजगारों को रोजगार मुहैया कराने कितने गंभीर है। यदि बेरोजगारों के हित में साल भर में भी कोई कारगर योजना लागू होता है तब सरकार जाग गई और बेरोजगारों का यह विरोध सफल माना जाएगा। लेकिन यदि इतने बड़े बेरोजगार आवाम के आह्वान पर भी सरकार नहीं जागी। बेरोजगारी के इस गंभीर समस्या पर गंभीर नहीं हुए। तो लानत है लेकिन सरकार पर ! जो बड़ी समस्या को लेकर मुंह फेर ले। बेरोजगारी की इस स्थिति को विकराल बनाने में हर एक सरकार का हाथ है जिसका खामियाजा आज हर एक शिक्षित युवा बेरोजगार भुगत रहे हैं और चाहे वो राज्य का हो या फिर केंद्र का, सभी बेपरवाह सरकारों ने बेरोजगारों को उनके अधिकार से वंचित कर दिए है। यह तरीका सभी के लिए हो और जनहित से जुड़े मुद्दे पर सरकार को जगाने ऐसे ही जन्म दिवस पर विरोध जतानना जायज है क्योंकि सरकार से जनता का संवाद का यह तरीका बेहतर है बशर्ते सरकार के पद और प्रतिष्ठा को लेकर अनैतिक,अवैधानिक,शब्दों का तरीको का इस्तेमाल ना हो। बेरोजगार ही नही हर मुद्दे पर सरकार के खिलाफ उन्हें इस तरह घेरना और जवाब मांगना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है भरत की जनता का मौलिक अधिकार है।
।।जय हिन्द।।
।।जय हिन्द।।



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