विजयादशमी में शस्त्र पूजा का महत्व,,,दशहरा पर्व पर विशेष.....

 विजयादशमी में शस्त्र पूजा का महत्व,,,दशहरा पर्व  पर विशेष..... 

भगवान राम "जया" और "विजया"नाम की देवियों की पूजा करके युद्ध करने पहुंचे।

◆ दशहरे के दिन घरों,प्रतिष्ठानों में "हथियारों" की विधिवत की जाती है पूजा।

★ संकलन : डॉ सुरेश यादव

★  मिशन क्रांति न्यूज. धर्म-कर्म

मिशन क्रांति न्यूज. जांजगीर-चाम्पा। असत्य पर "सत्य" की "जीत" का पर्व यानि "दशहरा" अश्विन महीने की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 25 अक्टूबर को हर्षोल्लास से मनाया जाएगा। विजयदशमी पर्व जिसे दशहरा भी कहते हैं। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था।  तब से हर विजयदशमी पर रावण का पुतला जलाया जाता है और राम की विजय को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक समझा जाता है।

भगवान राम जया और विजया नाम की देवियों की पूजा करके युद्ध के लिए निकले थे, इसलिए दशहरे पर भगवान राम के साथ इन देवियों की भी पूजा होती है।शस्त्रों, यानी हथियारों की पूजा करना ही इनकी पूजा का एक हिस्सा है।दशहरा मूल रूप से शक्ति का उत्सव है।शक्ति के प्रतीक हथियार हमारी रक्षा करते हैं, इसलिए इनकी पूजा की जाती है।भारतवर्ष में दशहरे के दिन घरों,प्रतिष्ठानों में हथियारों की विधिवत् पूजा करने का चलन है।हम अपनी रक्षा के लिए शस्त्रों का प्रयोग करते हैं।देश की बाह्य और आंतरिक सीमा की सुरक्षा इन्ही शस्त्रों से की जाती है।दशहरा के दिन इन्ही अस्त्रों में जया और विजया देवी का वास मानकर इनकी पूजा की जाती है। 


रामायण काल के हथियार आज के उन्नत परमाणु हथियारों से भी अधिक शक्तिशाली और विनाशकारी थे।उन हथियारों से पूरे विश्व का विनाश किया जा सकता था। दैवीय एवम् मायावी शक्तियों से युक्त ये अस्त्र-शस्त्र आज भी काफी प्रासंगिक हैं। रामायण काल के प्रमुख हथियार में ब्रह्मास्त्र को जगत्पिता ब्रह्मा ने दैत्यों के नाश हेतु ब्रह्मास्त्र की उत्पत्ति की थी।यह बहुत घातक,अचूक और सर्वश्रेष्ठ हथियारों में से एक माना जाता था।इस हथियार का जीवन काल में केवल एक बार इस्तेमाल किया जा सकता था।यह इतना शक्तिशाली था कि इसके चलने मात्र से ही पृथ्वी और तमाम ग्रहों पर भूकंप -सा आ जाता था।यह शस्त्र खुद ही अपनी ऊर्जा प्रकट करता था और उस ऊर्जा से विनाश करता था।ब्रह्मास्त्र को ब्रह्मास्त्र से ही काटा जा सकता था।रामायण काल में युद्ध में जब लक्ष्मण जी इंद्रजीत पर भारी हो गए तब इंद्रजीत ने लक्ष्मण पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। लेकिन ब्रह्मास्त्र लक्ष्मण जी के सामने निस्तेज होकर वापस लौट आया था। इसी तरह ब्रह्मशिरा अस्त्र:- ब्रह्मशिरा का अर्थ होता है ब्रह्मा जी का सिर ।परमपिता ब्रह्मा जी ने ब्रह्मास्त्र से भी अधिक शक्तिशाली ब्रह्मशिरा अस्त्र बनाया था।इसमें ब्रह्मास्त्र की तुलना में चार गुना अधिक शक्ति थी।ब्रह्मशिरा अत्यंत विनाशक बाण होते थे।ये मंत्रों से चलाए जाते थे।मेघनाद को ब्रह्मा के वरदान से ब्रह्मशिरा नामक अस्त्र प्राप्त हुआ था।रामायण काल में मेघनाद ने वानर सैनिकों का नाश करने के लिए इसका प्रयोग किया था।इससे लगभग 67 करोड़ वानर सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे ।

वैष्णव अस्त्र:- यह नारायणास्त्र वैष्णव या विष्णु अस्त्र के नाम से भी जाना जाता है।एक बार इसे चलाने के बाद दूसरा कोई अस्त्र इसे काट नहीं सकता था। इससे बचने का सिर्फ एक उपाय था कि शत्रु हथियार डालकर स्वयं को समर्पित कर दे। दारू पंच अस्त्र का अविष्कार दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य भार्गव ने किया था। इसका दूसरा नाम " रुद्र कीर्तिमुख " भी था। इस यंत्र में शत्रु की गतिविधि का चित्र उभर आता था। फिर यंत्र के मुख से अग्नि गोला निकलता और शत्रु का संहार करता था। यह यंत्र लंका के द्वार पर लगाया गया था। लंका की रक्षा में इसका अहम् योगदान था। श्री राम ने लंका के द्वार पर लगे 'दारू पच अस्त्र' को प्रक्षेपास्त्र छोड़कर नष्ट कर दिया था। सूर्यहास खड्ग का आविष्कार तपस्वी शूद्र ऋषि शंबूक ने अपनी वेधशाला में किया था। इसमें सौर ऊर्जा के संग्रहण की क्षमता थी। शत्रु दल पर इसका प्रयोग करते ही वे इसमें चिपक जाते थे। यह शत्रु का रक्त खींच लेता था और शत्रु को मृत्यु लोक पहुँचा देता था। प्रसवापन अस्त्र रावण की नाभि में था और अमृत के कारण वह मर नहीं रहा था। राम ने उसकी नाभि में स्थित अमृत को सुखाने के लिए ' प्रसवापन अस्त्र ' का प्रयोग किया था। चंद्रहास अस्त्र चंद्रहास नामक तलवार है। वह सच में तलवार नहीं, बल्कि एक खड्ग था जो बहुत भारी था।यह प्रकाश की दिशा को मोड़ सकता था। इसे भगवान शिव ने रावण पर प्रसन्न होकर उसे वरदान स्वरूप दिया था । नागपाश अस्त्र,,नागपाश अर्थात् शत्रु को बांँधने के लिए एक प्रकार का बंधन या फंदा। यह ढाई फेरे का बंधन होता था। यह एक प्रकार का रासायनिक अस्त्र था।इस अस्त्र का प्रयोग करके शत्रु के शरीर में जहरीले सर्पों के विष का प्रवेश कराया जाता था ।मेघनाद ने इसे इंद्र से प्राप्त किया था। गंधर्व अस्त्र चित्रकूट में दैत्य वंशीय खर और दूषण का शासन था।वे रावण के रिश्ते के भाई थे।जब लक्ष्मण ने सूर्पणखा के नाक- काट दिए तो वह उन्ही दैत्यों के पास मदद के लिए गई थी। वे दोनों राम -लक्ष्मण से युद्ध करने के लिए चौदह सहस्त्र सेना लेकर आये। असुर सेना मायावी थी।श्री राम ने 14000 असुरों का संहार करने के लिए गंधर्व अस्त्र का प्रयोग किया था। पुष्पक विमान रामायण काल में रावण के पास कई लड़ाकू विमान थे। पुष्पक विमान उनमें से एक था।पुष्पक विमान के निर्माता ब्रह्मा जी थे। ब्रह्मा ने यह विमान धन के देव कुबेर को दिया था। कुबेर से इसे रावण ने छीन लिया था । पुष्पक विमान मोर जैसी आकृति का विमान था। यह अग्नि और वायु की उर्जा से चलता था। इसकी गति तीव्र थी और चालक की इच्छानुसार इसे किसी भी दिशा में गतिशील रखा जा सकता था।

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