सरकारी "दफ्तरों" में अफसरशाही हावी,,,आम "जनता" से सीधे मुंह बात नहीं करते अधिकारी
सरकारी "दफ्तरों" में अफसरशाही हावी,,,आम "जनता" से सीधे मुंह बात नहीं करते अधिकारी
◆ पब्लिक सर्वेंन्ट होने के बावजूद इनका "तानाशाह" रवैया के चलते दफ्तर जाने से कतराते हैं लोग...◆ जनप्रतिनिधि और रसूखदारों को बस दी जाती है तवज्जो।
◆ उच्चाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को अफसरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की जरूरत।
डायमंड शुक्ला
मिशन क्रांति न्यूज. जांजगीर - चाम्पा। जिले में अफसरशाही हावी है,,,एक दो विभागों को छोड़ सभी विभाग के आला अफसरों का "तानाशाह" रवैया किसी से अछूता नहीं है,,सरकारी दफ्तरों में आम लोग कामकाज के सिलसिले में भी जाने से भी इसलिए कतराते हैं क्योंकि आला अफसर आम लोगों से सीधे मुंह बात तक नही करते,ऐसे में भला इन जनाबों से काम की उम्मीद बेमानी होगी। हां अगर जनप्रतिनिधि या कोई रसूखदार पहुंचे तो तो उनके साथ आवाभगत में कोई कमी नही होती। पर आम जनमानस तो दफ्तरों में अधिकारीयों से मिलने से भी कतराते हैं...क्योंकि ज्यादातर विभाग के अफसर खुद को पब्लिक सर्वेंट की बजाय बॉस की तरह पेश करते हैं जैसे वे सरकारी नुमाइंदे नहीं बल्कि खुद ही मालिक हो।
मिशन क्रांति न्यूज. जांजगीर - चाम्पा। जिले में अफसरशाही हावी है,,,एक दो विभागों को छोड़ सभी विभाग के आला अफसरों का "तानाशाह" रवैया किसी से अछूता नहीं है,,सरकारी दफ्तरों में आम लोग कामकाज के सिलसिले में भी जाने से भी इसलिए कतराते हैं क्योंकि आला अफसर आम लोगों से सीधे मुंह बात तक नही करते,ऐसे में भला इन जनाबों से काम की उम्मीद बेमानी होगी। हां अगर जनप्रतिनिधि या कोई रसूखदार पहुंचे तो तो उनके साथ आवाभगत में कोई कमी नही होती। पर आम जनमानस तो दफ्तरों में अधिकारीयों से मिलने से भी कतराते हैं...क्योंकि ज्यादातर विभाग के अफसर खुद को पब्लिक सर्वेंट की बजाय बॉस की तरह पेश करते हैं जैसे वे सरकारी नुमाइंदे नहीं बल्कि खुद ही मालिक हो।
दरअसल जिले में कृषि विभाग,पुलिस विभाग,खनिज विभाग, उद्यान विभाग, शिक्षा विभाग, मत्स्य विभाग, उपपंजीयपक का दफ्तर के अलावा अन्य कई विभाग हैं जहां सरकारी दफ्तरों में पदस्थ आला अफसर आम जनमानस से सीधे मुंह बात नहीं करते ऐसे में ज्यादातर लोग काम के सिलसिले में या तो उच्चाधिकारियों की बजाय कर्मचारियों से मिलकर उल्टे पांव वापस लौट आते हैं या फिर किसी रसूखदार या नेताओं के साथ अधिकारियों के चेम्बर में जाना मुनासिब समझते हैं आखिर आजाद भारत के आजाद लोगों में अपने ही देश के सरकारी नुमाइंदो से इतना खौफ क्यों रहता है यह बड़ा सवाल है जिसका माकूल जवाब शायद किसी के.पास नही है "मिशन क्रांति न्यूज" की टीम ने जब इस मामले में नवागढ़ ब्लाक,बलौदा ब्लाक, सक्ती ब्लाक और पामगढ़ ब्लाक के लोगों से बातचीत की तो ज्यादातर लोगों ने यही कहा कि सरकारी दफ्तरों में अधिकारियों से मिलने से डर लगता है, काम के सिलसिले में उनके चेम्बर में जाने से भी भय खाते हैं आखिर यह खौफ आम जनता मे क्यों है इस सवाल के जवाब मे लोगों ने यही कहा कि अधिकारी फटकार लगाते है या चिल्लाते हैं जिसके चलते वे कई बड़े मामलों में भी अधिकारियों से चाहकर भी मिलने से कतराते हैं.. हालाकि कुछ गिनती के कुछ आफिस के अधिकारियों की भूरी भूरी प्रशंसा भी किए लेकिन यह महज चंद लोगों की जुबान पर ही था बाकी सभी लोगों ने अफसरों का आम लोगों के प्रति उनके रवैया पर सवालिया निशान उठाए। बहरहाल बात जो भी हो लेकिन आधे से ज्यादा लोगों.ने यह बात स्वीकार किया कि अफसरशाही हावी है और वे सिर्फ रसूखदार और नेताओं के साथ जाने पर ही तवज्जो देते हैं लेकिन अकेले जाने से चिड़कर बात करते हैं अब ऐसे में यह कहना लाजमी होगा कि सरकारी दफ्तरों में अफसरशाही चरम पर है और इनका तानाशाह रवैया कतई उचित नही है। जिले के जिम्मेदार उच्चाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को ऐसे मामलों पर नकेल कसने की सख्त जरूरत है ताकि जनता अपनी समस्याओं अथवा कामकाज..के सिलसिले में बड़ी सहजता से आला अफसरों से मिल सके। और लोगों के प्रति अधिकारियों का उदारभाव दिखे। जिससे लोग अफसरो के रवैये पर नाराजगी जाहिर ना करे बल्कि उनके तारिफों के पूल बांधे। इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी सरकारी तंत्र में जनता के महत्व को नजरअंदाज कर उनकी उपेक्षा कतई उचित नही है।
निर्धारित समय पर भी काम के सिलसिले में जाने पर
खौफ खाते हैं लोग
सरकारी दफ्तरों में अधिकारियो से मिलने पढ़े लिखे लोग किसी तरह हिम्मत जुटाकर चले भी जाते हैं लेकिन ज्यादातर ग्रामीण लोग या शहर और गांव के गरीब तपके के लोग सीधे अधिकारी से मिलने जाने साथ कतराते हैं...
यह बात किसी से अछूता नही है पर उच्चाधिकारी और जनप्रतिनिधि मौन है। इसी के फेर में ज्यादातर लोगों का काम कई बार लटका रहता है। या कई बार काम होता ही नही। जिससे आए दिन दफ्तरों का लगातार चक्कर काटना पड़ता है और यह अनवरत जारी रहता है जबकि ऐसे लोगों के कुछ सरकारी काम महज एक दो दिन में हो करने लायक होता है। हालाकि सरकारी कर्मचारी भी कई दफा इन्हें अफसरों से मिलना पर मना कर देश ते हैं जिसके कारण काम नही होता और समस्याओं का समाधान नही हो पाता।
अफसरों का व्यवहार ऐसा कि सरकारी चेम्बर ना होकर खुद का चेम्बर हो
सरकारी दफ्तरों में पब्लिक सर्वेंट होते हुए भी ज्यादातर विभाग के आला अफसरों को रवैया ऐसा होता है मानो वह सरकारी दफ्तर ना होकर खुद का चेम्बर हो और वहां आने वाले लोग उनसे मिलने आए हैं अपने काम से,पर ये भूल जाते हैं कि वे पब्लिक सर्वेंट है जिन्हें उनके कामकाज के एवज में ही सरकार मानदेय देती है पर इन जनाबों को कौन समझाए ये तो खुद मिलिक बन जाते हैं और आम लोगों से व्यवहार ऐसा करते हैं जैसे वो सरकारी दफ्तर की बजाय किसी जमीदार के यहां बैठे हैं और लोग उनसे कामकाज अथवा समस्याओं के समाधान हेतू मिन्नतें कर रहे हों। जी हां यह सुनने में भले ही अटपटा लगे, पर यही हकीकत है सरकारी सिस्टम का।
क्या कहते हैं जनप्रतिनिधि...
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सरकारी दफ्तरों में अधिकारियो से मिलने पढ़े लिखे लोग किसी तरह हिम्मत जुटाकर चले भी जाते हैं लेकिन ज्यादातर ग्रामीण लोग या शहर और गांव के गरीब तपके के लोग सीधे अधिकारी से मिलने जाने साथ कतराते हैं...
यह बात किसी से अछूता नही है पर उच्चाधिकारी और जनप्रतिनिधि मौन है। इसी के फेर में ज्यादातर लोगों का काम कई बार लटका रहता है। या कई बार काम होता ही नही। जिससे आए दिन दफ्तरों का लगातार चक्कर काटना पड़ता है और यह अनवरत जारी रहता है जबकि ऐसे लोगों के कुछ सरकारी काम महज एक दो दिन में हो करने लायक होता है। हालाकि सरकारी कर्मचारी भी कई दफा इन्हें अफसरों से मिलना पर मना कर देश ते हैं जिसके कारण काम नही होता और समस्याओं का समाधान नही हो पाता।
अफसरों का व्यवहार ऐसा कि सरकारी चेम्बर ना होकर खुद का चेम्बर हो
सरकारी दफ्तरों में पब्लिक सर्वेंट होते हुए भी ज्यादातर विभाग के आला अफसरों को रवैया ऐसा होता है मानो वह सरकारी दफ्तर ना होकर खुद का चेम्बर हो और वहां आने वाले लोग उनसे मिलने आए हैं अपने काम से,पर ये भूल जाते हैं कि वे पब्लिक सर्वेंट है जिन्हें उनके कामकाज के एवज में ही सरकार मानदेय देती है पर इन जनाबों को कौन समझाए ये तो खुद मिलिक बन जाते हैं और आम लोगों से व्यवहार ऐसा करते हैं जैसे वो सरकारी दफ्तर की बजाय किसी जमीदार के यहां बैठे हैं और लोग उनसे कामकाज अथवा समस्याओं के समाधान हेतू मिन्नतें कर रहे हों। जी हां यह सुनने में भले ही अटपटा लगे, पर यही हकीकत है सरकारी सिस्टम का।
क्या कहते हैं जनप्रतिनिधि...
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अकलतरा विधायक सौरभ सिंह ने जिले के आला अफसरों की तानाशाही रवैये को सीधे तौर पर प्रशासनिक आतंकवाद करार दिया है,,,विधायक श्री सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ये जनता के सेवक हैं पर ये जनता का काम करते ही नहीं है,भ्रष्टाचार चरम पर है अधिकारियों से काम नही होने की वजह से जब जनता जनप्रतिनिधियों के पास आते हैं और जनप्रतिनिधि जब अफसरों से जनता की समस्याओं से अवगत कराते हुए कामकाज करने की बात करते हैं तो अफसर उस समय हामी तो जरूर भरते हैं लेकिन जब लोग काम के सिलसिले में अधिकारी से मिलते हैं तो ये जनता के प्रति अपना कर्तव्य भूल जाते हैं। और लोगों को अलग ही लहजे में डांट फटकार लगाते हुए नेतागीरी कराने की बात करते हैं कुछ अधिकारी दबी जुबान से लेनदेन तक की भी बात करते हैं। लोकतंत्र की साख को अधिकारी खत्म करने आमादा हैं ,,जहां अफसरशाही पूरी तरह हावी है। जो आम जनमानस और लोकतंत्र के लिए खतरा है।
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अफसरों की मनमानी से लोग हलाकान,,,
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अफसरों की मनमानी से लोग हलाकान,,,
तानाशाह रवैया
पामगढ़ विधायक श्रीमती इंदू बंजारे ने जिलें में अफसरशाही पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जनता जब भी अपनी समस्याएं अथवा काम के सिलसिले में किसी अफसर से मिलने उनके कक्ष में पहुंचते हैं तो अधिकारी लोगों से सीधे मुंह बात नही करते,,अधिकतर लोग अधिकारियों के दुर्वयवहार का शिकार भी होते हैं पर ग्रामीण उनसे सवाल जवाब करने के बजाय उल्टे पांव सरकारी दफ्तर से वापस लौट आते हैं...ऐसे में वह दोबारा सरकारी दफ्तर हो या अधिकारी उनसे मिलने में गुरेज करते हैं जिले के अधिकांश अधिकारी कर्मचारी बेलगाम हो गए हैं आम नागरिक काफी परेशान है अनेकों बार कार्यालय का चक्कर लगाने के बावजूद उन लोग के बातों को नहीं सुना जा रहा है और तो और जनप्रतिनिधियों का भी बातों को नजरअंदाज किया जाता है इस तरह से जिला में अफसरशाही हावी है। पब्लिक सर्वेंट का जनता के प्रति यह रवैया उचित नही हैं लोकतंत्र में लोगों की बातें.सहजता से सुनी जानी चाहिए। और निर्धारित मापदंडों के अनुरूप काम होना चाहिए।
एक्सपर्ट ब्यू
बिलासपुर हाईकोर्ट के अधिवक्ता अंकित पाण्डेय ने बताया कि यदि सरकारी दफ्तर मे कोई अधिकारी
लोगों से दुर्व्यवहार करता है तो ऐसे अधिकारी के खिलाफ सीधे सर्वोच्च अधिकारी के पास शिकायत दर्ज की जा सकती है, और विभागीय जांच के लिए पूछ सकते हैं, क्योंकि दुर्व्यवहार, जोर, गुस्सा, कर्कश आदि कदाचार हैं, ऐसे में उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई शुरू की जा सकती है। लोगों को सर्वोच्च अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराना चाहिए।
पामगढ़ विधायक श्रीमती इंदू बंजारे ने जिलें में अफसरशाही पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जनता जब भी अपनी समस्याएं अथवा काम के सिलसिले में किसी अफसर से मिलने उनके कक्ष में पहुंचते हैं तो अधिकारी लोगों से सीधे मुंह बात नही करते,,अधिकतर लोग अधिकारियों के दुर्वयवहार का शिकार भी होते हैं पर ग्रामीण उनसे सवाल जवाब करने के बजाय उल्टे पांव सरकारी दफ्तर से वापस लौट आते हैं...ऐसे में वह दोबारा सरकारी दफ्तर हो या अधिकारी उनसे मिलने में गुरेज करते हैं जिले के अधिकांश अधिकारी कर्मचारी बेलगाम हो गए हैं आम नागरिक काफी परेशान है अनेकों बार कार्यालय का चक्कर लगाने के बावजूद उन लोग के बातों को नहीं सुना जा रहा है और तो और जनप्रतिनिधियों का भी बातों को नजरअंदाज किया जाता है इस तरह से जिला में अफसरशाही हावी है। पब्लिक सर्वेंट का जनता के प्रति यह रवैया उचित नही हैं लोकतंत्र में लोगों की बातें.सहजता से सुनी जानी चाहिए। और निर्धारित मापदंडों के अनुरूप काम होना चाहिए।
एक्सपर्ट ब्यू
बिलासपुर हाईकोर्ट के अधिवक्ता अंकित पाण्डेय ने बताया कि यदि सरकारी दफ्तर मे कोई अधिकारी
लोगों से दुर्व्यवहार करता है तो ऐसे अधिकारी के खिलाफ सीधे सर्वोच्च अधिकारी के पास शिकायत दर्ज की जा सकती है, और विभागीय जांच के लिए पूछ सकते हैं, क्योंकि दुर्व्यवहार, जोर, गुस्सा, कर्कश आदि कदाचार हैं, ऐसे में उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई शुरू की जा सकती है। लोगों को सर्वोच्च अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराना चाहिए।



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