नक्सली हिंसा के लिए निकम्मी सरकार,,,है जिम्मेदार !
नक्सली हिंसा के लिए निकम्मी सरकार,,,है जिम्मेदार !
◆ आखिर कब तक "वीर सपूतों" को अपने "प्राणों" की देनी होगी आहूति।
मिशन क्रांति न्यूज. जांजगीर-चाम्पा।
छत्तीसगढ़ के बीजापुर में हुए नक्सली मुठभेड़ में फिर 22 जवान शहीद हो गए...और दर्जनों जवानों के घायल होने की खबर है। नक्सली समस्या कोई मामूली समस्या नही है। जिसे राज्य और केंद्र सरकार जितना हल्के में ले रही है। यह हृदय विदारक घटना है...जब - जब जवानों के खून से छत्तीसगढ़ लाल हुआ है। तब सिर्फ केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की बघेल सरकार ने शब्दों की श्रद्धांजलि और संवेदना व्यक्त कर जिम्मेदारियों से अपना पल्ला झाड़ लिए हैं। सरकार की संवेदनाएं मर चुकी है तभी तो शहीदों की शहादत व्यर्थ नही जाएगी की राग अलाप करने वाले ये जिम्मेदार नुमाइंदे आज पर्यन्त नक्सली समस्या से निपटने कोई खास रणनीति ही नही बना पाए। चाहे राज्य म़े कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की नक्सली समस्या पर कोई विशेष ध्यानाकर्षण नही रहा। शायद यही वजह है कि भाजपा के शासनकाल में भी तकरीबन सैकड़ो जवान शहीद हुए तब भी नाकाम सरकार शहीदों की शहादत व्यर्थ नही जाने की राग अलापते रहे, और आज भी यह सिलसिला थमा नही है। केंद्र में कॉंग्रेस की सरकार ने तो मानों नक्सली समस्या को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं। अब केंद्र में भाजपा सरकार का भी यही हाल है। जिन्हें छत्तीसगढ़ की माओवादी समस्या से कोई सरोकार नही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या इसी तरह छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा पर कभी विराम नही लगेगा? क्या सरकार तमाशबीन की तरह मूकदर्शक बनी रहेगी... सरकार की प्रथम जिम्मेदारी है कि कोई नई नीति बनाकर इस नक्सली समस्या का समाधान ढ़ूंढे और उसे धरातल पर लागू कर सार्थक पहल करे। जिससे नक्सली हिंसा पर अंकुश लग सके।◆ नक्सली हिंसा के बाद ग्रामीण आदिवासियों पर कहर !
नक्सली हिंसा या मुटभेड़ से जहां वीर जवान शहीद होते हैं इन शहीद जवानों में किसी का बेटा,किसी का सुहाग,किसी का भाई शामिल हैं। जिसके जाने के बाद परिवार बिखर सा जाता है। यह पीड़ा आजीवन परिजन नही भूल पाते हैं। वहीं दुसरा पहलू यह भी है कि कुछ आदिवासी आर्थिक तंगी की वजह से माओवादी से जुड़ जाते हैं हालाकि कई बार नक्सली दबाव बनाकर बंदूक की नोक पर भी उन्हें बंदूक थमाने कामयाब हो जाते हैं। नक्सली के साए म़े जी रहे आदिवासियों को इस तरह की घटना के बाद खौफ बना रहता है कि कहीं कुछ लोगों की वजह से पूरे गांव के आदिवासियों पर पुलिस का निशाना ना हो। क्योंकि कुछ हाल पहले इसी तरह की कार्रवाई भी हुई थी जिसमें आदिवासियों के सैकड़ो आशियाने आग के हवाले कर दिया गया था। कई गांव खाली हो गए थे। ऐसे में बस्तर के आदिवासी दहशत के साए म़े जीवन जी रहे हैं।
◆ नक्सली मुठभेड़ में शहीद हुए उप निरीक्षक दीपक भारद्वाज को राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई
जांजगीर- चांपा। बीजापुर नक्सली मुठभेड़ में गत 3 अप्रैल को शहीद हुए उप निरीक्षक श्री दीपक भारद्वाज को आज उनके गृह ग्राम मालखरौदा ब्लाक के पिहरीद में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। पिहरीद के मुक्तिधाम में सांसद श्री गुहाराम अजगल्ले, छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. महंत रामसुंदर दास महंत, विधायक श्री केशव चंद्रा, चंद्रपुर विधायक श्री राम कुमार यादव, आईजी श्री रतनलाल डांगी, एसपी श्रीमती पारुल माथुर, अपर कलेक्टर श्रीमती लीना कोसम, श्री रवि शेखर भरद्वाज, पूर्व विधायक श्री निर्मल सिन्हा, श्रीमती रश्मि गबेल, चौलेश्वर चंद्राकर, श्रीमती तुलसी साहू ने पुष्प चक्र अर्पित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इसके पूर्व शहीद दीपक भारद्वाज का पार्थिव शरीर उनके निवास स्थल पर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया। जहाँ उनके परिजनों सहित उनके इष्ट मित्रों ने ने उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी । निवास स्थान से मुक्तिधाम तक बड़ी संख्या में लोग अंतिम यात्रा में शामिल हुए। शहीद दीपक भारद्वाज के पिता राधे लाल भारद्वाज ने उन्हें मुखाग्नि दी।

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