देश में कोरोना महामारी के बढ़ते संक्रमण और सरकार एवं निर्वाचन आयोग का चुनावी शंखनाद !

 देश में कोरोना महामारी के बढ़ते संक्रमण और सरकार एवं निर्वाचन आयोग का चुनावी शंखनाद !

★ प्रधान संपादक डायमंड शुक्ला की कलम से...
आपदा को नजरअंदाज कर लापरवाह और मूकदर्शक बन गए देश के कर्णधार और इलेक्शन कमेटी।


वैश्विक महामारी कोरोना की मार झेल रहे देश की सरकार को जनता की सेहत का जरा भी परवाह नही है...
शायद यही वजह है कि देश के अलग - अलग कुछ राज्यों में चुनावी शंखनाद कर जगह - जगह चुनावी सभा ,,चुनावी रैली निकालकर देश की जनता को यह बता दिया कि कोरोना महामारी के प्रति सरकार की सजगता कितनी है..वे देश की जनता के स्वास्थ्य को लेकर कितने गंभीर है। वहीं निर्वाचन आयोग की भूमिका भी उक्त मामले में संदिग्ध है वह भी कटघरे में है। कोरोना महामारी के बढ़ते संक्रमण के बावजूद निर्वाचन कराने ने जो फरमान जारी किया। यह देश की जनता के लिए कितना हितकर और न्यायोचित है इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है...जी हां हम देश के असम और पश्चिम बंगाल में हो रहे निर्वाचन की बात कर रहे हैं जहां चुनावी सभा व रैली में उमड़ रही भीड़ सरकार के रवैये और आयोग के लापरवाही को उजागर करता है...सरकार अन्य राज्यों में कोरोना महामारी का खौफ बताकर जहां स्कूल,कालेज, रेस्टोरेंट,होटल, माल,लाज,सिनेमा हाल सहित सभी दुकानों के लिए कोरोना गाईडलाईन जारी कर दिया गया है ....स्कूल खुलने के बाद फिर स्कूल बंद करने का फरमान भी जारी करने में गुरेज नही किया ...क्योंकि इनके खुलने से जनता पर कोरोना का कहर बरसना शुरू हो जाएगा। इसलिए कोरोना के मद्देनजर एहतियात बरतने सरकारी तंत्र द्वारा बार बार हिदायत दी जा रही है वहीं चुनाव हो रहे राज्यों में चुनावी सभा व रैली में ना तो मास्क, लगाए जा रहे और ना ही किसी तरह के कोरोना के नियम और शर्ते लागू की गई। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी को लेकर सरकार का यह दोहरा मापदंड कितना उचित है यह किसी से छिपी नही है। सरकार कोरोना के प्रति कितने गंभीर है यह देश की जनता के सामने है...स्कूल खुलने लगे थे...स्कूल कालेजों को बंद कराने फरमान जारी कर दिया गया...लेकिन चुनाव हो रहे राज्यों में कोरोना का पता तक नही शायद !.तभी तो सरकार यहां कोरोना की बात तक नही कर रहे और अन्य राज्यों में कोरोना का खौफ बताकर कई तरह के नियम व शर्तें लागू कर जनता को मास्क नही लगाने पर आर्थिक दंड तक दिया जा रहा है...विडम्बना तो यह है कि उक्त चुनाव.में सभी राजनैतिक पार्टियों के दिग्गज बकायदा उक्त राज्यों में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ भीड़ लेकर जा रहे हैं और वापस लौट रहे हैं ऐसे में इन नुमाइंदों को खुली छूट है पर आम जनता दो किलोमीटर का सफर अकेले भी कर ले तो आर्थिक दंड थोप दिया जाता है जबकि नेता बाहर अलग -अलग राज्यों से जाकर वापस अपने अपने राज्य वापस लौट रहे वह भी बिना कोरोना गाईडलाईन का परिपालक किए बगैर। ऐसे में राजनेताओं की ओछी मानसिकता का खुलासा भी हो रहा है जहां चुनाव हो रहे राज्यों को छोड़ दें तो शेष राज्यों में महामारी का खौफ बताकार कोरोना के लिए नियम व शर्ते लागू कर खुद की पीठ थपथपा रहे हैं और वैश्विक महामारी के प्रति अपनी सजगता जाहिर करना चाह रहे हैं। पर जनता जनार्दन को सरकार के मुखौटे समझ में आने लगा है। असली चेहरा साफ हो गया है पर खौफ कोरोना से ज्यादा सरकारी तंत्र के दोहरा चरित्र से है जो पर्दे की पीछे कोरोना की आड़ मे जनता को गुमराह करने पर आमादा है।
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