जल,जंगल और जमीन के संरक्षक, प्रकृति प्रेमी आदिवासियो के नही बदले हालात,,, अफ़सोस फिर भी सरकार खामोश !

 जल,जंगल और जमीन के संरक्षक, प्रकृति प्रेमी आदिवासियो के  नही बदले हालात,,, अफ़सोस फिर भी सरकार खामोश !


🔷 विश्व आदिवासी दिवस पर सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें कर निभाई जाएगी औपचारिकताएं।

🔶 डायमंड शुक्ला

प्रधान संपादक "मिशन क्रांति न्यूज़"🔶


मिशन क्रांति न्यूज़ जांजगीर चांपा।

प्रकृति से अथाह प्रेम,,,प्रकृति प्रेमी जो ठहरे भोले भाले आदिवासी ये मूल निवासी भी हैँ , प्रकृति की गोद में पले, बढ़े आदिवासियों की पीड़ा आज पर्यंत ना किसी ने समझा और ना जाना, ...ना कोशिश् हुई जानने की कभी,,, हरे पौधे,जंगल में पेड़ के पत्तों से ढके घर बारिश की बूंदो से, कड़ाके की सर्दी और् ठंड से बचने ,,,मिट्टी और लकड़ी से खुद घर बना लिए... जिंदगी जीना जो है, सड़को और नाले पर भी लकड़ी जे पुल बना लिए और हौसलो से लाघ गये कई नदी,नाले पहाड़,, सरकार को कोई फर्क भला क्यो पड़े, बस वोट के समय इन्हे वोट बैंक समझ याद कर लिए जाएंगे...हर बर की तरह... पर अपने में मस्त आदिवासियो का गाना,बजाना, अपनी सभ्यता, संस्कृति का सहजता,सरलता पालन कर जीवन का आनंद लेना कोई इनसे सीखे... आदिवासियों को किसी से कोई शिकवा, ना शिकायत, सरकार बदले, हालात ना बदले, बल्कि नक्सली ख़ौफ़ लिए, कई अपनो को खो दिये, कभी सरकारी नुमाइंदो ने मुख़िबरी के शक पर भोले- भाले आदिवासी को सलाखों के पीछे धकेल दिया, तो कभी मुठभेड़ मे नक्सली समझकर गोलियों से ढेर कर दिये गये, कभी नक्सलियों ने इन्हे बेवजह क्रूरता से मौत के घाट उतार दिये... फिर भी खामोश हैँ,,, जुल्म की दास्तान बताये किसे...?

कोई रहनुमा हो भी तब मुंह खुले...!!! सरकारी सिस्टम तो खुद ही, विकास के नाम पर उद्योगो की आड़ में आदिवासियों के दुश्मन बनकर...जंगल हथिया लिए गये, विरोध करने पर सीने में गोलियां दाग रहे... भला वो जाये कहाँ, ,, आंदोलन की भी इजाजत नही मानो क्योंकि डंडे के बलबूते इन्हे जख्म देने का दौर जारी है पर ये अडिग हैँ अपने इरादों पर, ये आदिवासी हैँ जनाब, ना बिकते हैँ ना टूटते हैँ, जल,जंगल के लिए मर मिटते हैँ... यही लोग हैँ जो जंगल को सुरक्षित रखने हरदम तैयार रह्ते हैँ... सरकार और सरकारी तंत्र भाले ही प्रकृति से अलग करने सारे हथकंडे अफना रहे,,, आज भी तन ढकने को पर्याप्त कपड़ा नही,कोई परिधान नहीं, चंद कपड़े तन पर लपेटे, अपनी धुन में चल रहे, जिंदगी के अनजाने पथ पर, अंधेरों को चिरते, नई रौशनी की आस लिए...जंगल में बसे छोटे छोटे गांव में भाईचारे और आत्मीयता लिए जी रहें हैँ जिंदगी, वजूद की खातिर जुल्म सहते अडिग है आज भी आदिवासी, जल,जंगल और जमीन को बचाने...

पर अफ़सोस सरकार सिर्फ विश्व आदिवासी दिवस पर बड़ी बड़ी बातें कर सिर्फ औपचारिकताएं निभाएगी... पर जमीनी हकीकत कुछ और ही बया कर रही है... जो किसी से अछूता नहीं।

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