"महफूज" नहीं पत्रकार ! देश में "पत्रकार सुरक्षा कानून" की शीघ्र दरकार

  "महफूज" नहीं पत्रकार ! देश में "पत्रकार सुरक्षा कानून" की शीघ्र दरकार

संपादकीय

★ डायमंड शुक्ला,प्रधान संपादक

मिशन क्रांति न्यूज.


हमारे देश में जब तक "पत्रकार सुरक्षा कानून" लागू नहीं होगा...पत्रकार "महफूज" नहीं है। "पत्रकारिता" पर खतरा मंडरा रहा है ...आज देश का "चौथा स्तंभ" खतरे में है, और इसका प्रमुख कारण है, शासन-प्रशासन के नुमाइंदों द्वारा ऐसे आसामाजिक तत्वों को संरक्षण देना, जो "पत्रकारों" के खिलाफ झूठे आरोप मढ़ देते हैं, और कई बार "पत्रकारों" के खिलाफ झूठे मामले में अपराध पंजीबद्ध तक हो जाता है और पत्रकारों जेल तक जाना पड़ा है, ...यह घटना तब तक नहीं रूकेगी जब तक सरकार "पत्रकार" हित में कोई ठोस कदम नही उठाएगी। "पत्रकार सुरक्षा कानून" लागू नहीं करेगी। जब "पत्रकार" किसी राजनेता, भूमाफिया, खनिज माफिया, ठेकेदार, किसी रसूखदार या असामाजिक तत्वों के खिलाफ समाचार प्रकाशन करते हैं तो ये बौखला जाते हैं और पत्रकार को डराने,,,धमकाने की कोशिश भी करते हैं, और बौखलाहट में कई बार उक्त नुमाइंदे पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना को अंजाम देते हैं रायपुर कांकेर , अंबिकापुर,कोटा सहित छ्ग्ग के कई जिलों की घटना इसका ताजा उदाहरण है। 

छग में ही ऐसी अनेक घटनाएं हुई है, पूरे देश मे "पत्रकारों" पर अक्सर पैसों के लेनदेन का या ब्लैकमेलिंग का आरोप सहजता से लगा देते हैं...और पुलिस प्रशासन भी कई बार ऐसे मामलों में बगैर जांच किए, एफआईआर दर्ज कर देते हैं। यह भी जानने की कोशिश नहीं करते कि जो "पत्रकार" के खिलाफ एफआईआर करा रहे हैं उनके खिलाफ में कोई खबरे प्रकाशित हुई है क्या ? और उस खबर की सत्यता क्या है...? ऐसे कई सवालात हैं जो पुलिसिया कार्रवाई को अनुचित ठहराता है। पुलिस द्वारा जब "पत्रकार" के खिलाफ मामला पंजीबद्ध किया जाता है तो असामाजिक तत्वों का मनोबल बढ़ जाता है और कुछ हद तक यहां "पत्रकारिता" की साख कमजोर हो जाती है यहां यह बताना लाजमी होगा कि सुप्रिम कोर्ट का सख्त आदेश है कि "पत्रकार" को भीड़ का हिस्सा ना माना जाए। बावजूद इसके सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना सरकारी तंत्र द्वारा किया जाता है। खासकर पुलिस प्रशासन की भूमिका इसमें ज्यादा संदिग्ध रहता है। कुछ भ्रष्ट प्रशासनिक अफसर जिनके खिलाफ में अक्सर खबरे प्रकाशित होती रहती है वे भी पत्रकारों से खुन्नस रखते हुए ऐसे फर्जी एफआईआर का सहारा लेते हैं...या पुलिस प्रशासन को कार्रवाई के लिए बाध्य करते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप भी पत्रकारों के खिलाफ मामला पंजीबद्ध हो जाता है। जरा सोचिए पत्रकार सकारात्मक खबरे प्रकाशित करे तो भले ही पीठ थपथपाने,शाबाशी देने नही आता। "पत्रकार" किसी से इस तरह की अपेक्षा भी नही रखते। लेकिन जब उनके खिलाफत में एक लाईन की खबर प्रकाशित हो जाए...या इलेक्ट्रानिक मीडिया में खबरें प्रसारित हो। ये मीडिया के दु्श्मन बन जाते हैं। और फिर पत्रकारों के लिए पुलिस प्रशासन से मिलीभगत कर एक रणनीति के तहत झूठे मामले में साजिश के तहत फंसाया जाता है। इसके बावजूद "पत्रकार" अपनी जानजोखिम में डालकर झूठ का पर्दाफाश करता है सच सामने लाता है। देश में जाने कितने "पत्रकारों को अपनी जान भी गवानी पड़ी है। और कई "पत्रकारों" को झूठे आरोप में जेल की हवा खानी पड़ी है...आज भी "पत्रकार" से जुड़े कई मामले न्यायालय में लंबित है। अब सवाल यह उठता है कि देश के "चौथे स्तंभ" की सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगे तो आम लोगों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगना लाजमी है। अगर देश में "पत्रकार" सच खबरें दिखाना बंद कर दे तो "जिसकी लाठी उसकी भैंस" वाली कहावत चरितार्थ होते देर नहीं लगेगी। चौथा स्तंभ "लोकतंत्र" की महत्वपूर्ण कड़ी है इसे सुरक्षित रखना सरकार की जवाबदेही है।

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